जानिए कहाँ की जाती है योनि की पूजा -प्रसाद में दिया जाता है खून से भरा कपड़ा

असम का वही मंदिर है, जो दुनियाभर में अपनी मान्यताओं के लिए प्रसिद्ध है. इसे तंत्र साधना और अघोरियों का गढ़ भी कहा जाता है. गुवाहाटी से करीब 8 किलोमीटर की दूर, नीलांचल पर्वत के बीचों-बीच स्थित कामाख्या मंदिर हर रोज़ समाज की संकुचित सोच को उसका आईना दिखाता नज़र आता है, लेकिन वो बात और है कि हम इसे देख कर भी अनदेखा कर देते हैं. आजतक आपने मंदिर से जुड़े कई रहस्यों और कथाओं के बारे में सुना होगा, लेकिन आज आपको बताते हैं मंदिर का वो दूसरा पहलू, जो पीरियड्स को लेकर संकुचित सोच को हर तरह से चैलेंज कर रहा है.

  1. मासिक धर्म को माना जाता है पवित्र

दक्षिण भारत के अलावा, अधिकांश भारत में मासिक धर्म को अशुद्ध माना जाता है. इस दौरान महिलाओं को किसी भी शुभ कार्यों में शामिल होने पर मनाही होती है, इसके साथ ही कहीं-कहीं मासिक धर्म के दौरान महिलाओं को काफ़ी प्रताड़ित भी किया जाता है, लेकिन मासिक धर्म के दौरान कामाख्या देवी को सबसे पवित्र होने का दर्जा प्राप्त है.

कामाख्या देवी को ‘बहते रक्त की देवी’ भी कहा जाता है. ऐसी मान्यता है कि ये देवी का एकमात्र ऐसा स्वरूप है, जो नियमानुसार प्रतिवर्ष मासिक धर्म के चक्र में आता है. ऐसा कहा जाता है कि हर साल जून के महीने में कामाख्या देवी रजस्वला होती हैं और उनकी योनि से रक्त प्रवाह होता है, साथ ही उनके बहते रक्त से ब्रह्मपुत्र नदी का रंग लाल हो जाता है.

इससे एक चीज़ तो साफ़ है कि मासिक धर्म को लेकर ये छुआ-छूत की धारणा हमारे पूर्वजों की बनाई हुई नहीं है, क्योंकि अगर मासिक धर्म को लेकर अपवित्र सोच हमारे पूर्वजों की होती, तो कामाख्या देवी को ‘बहते रक्त की देवी’ न कहा जाता.

  1. तीन दिन के लिए मां को दिया जाता है विश्राम

एक ओर जहां देश की महिलाएं चाह कर भी मासिक धर्म के दौरान आराम नहीं कर पाती, या यूं कहें कि घर और ऑफ़िस के चलते महिलाओं को आराम नसीब ही नहीं होता. वहीं कमाख्या देवी के मंदिर की परंपरा उसके बिल्कुल विपरीत है. हर साल जून में रजस्वला के समय तीन दिनों के लिए ये मंदिर बंद कर, मां को विश्राम करने दिया जाता है, लेकिन मंदिर के आसपास ‘अम्बूवाची पर्व’ मनाया जाता है. इस पर्व में सैलानियों के साथ तांत्रिक, अघोरी साधु और पुजारी भी मेले में शामिल होने के लिए आते हैं. इस दौरान शक्ति के उपासक, तांत्रिक और साधक नीलांचल पर्वत की अलग-अलग गुफ़ाओं में बैठकर साधना कर सिद्धियां प्राप्त करने का प्रयास करते हैं.

  1. प्रसाद में दिया जाता है रजस्वला का कपड़ा

अमूनन अगर सड़क पर या किसी और जगह कोई सेनेटरी पैड या पीरियड्स का कपड़ा पड़ा दिख जाए, तो हमें घिन आ जाती है. उसे छूना तो दूर की बात, गंदे कपड़े पर नज़र पड़ते ही हम सामने से मुंह फेर कर रास्ता बदल लेते हैं, है न? लेकिन क्या आपको पता है कि मां कमाख्या के रजस्वला के कपड़े को भक्तों में प्रसाद के रुप में दिया जाता है.

दरअसल, जब मां को तीन दिन का रजस्वला होता है, तो उस दौरान सफेद रंग का कपडा मंदिर के अंदर बिछा दिया जाता है. तीन दिन बाद जब मंदिर के दरवाजे़ खुलते हैं, तो वो कपड़ा पूरी तरह रक्त से भीगा होता है. इस कपड़े को अम्बुवाची वस्त्र कहते है. इसे ही भक्तों को प्रसाद के रूप में दिया जाता हैं. कहते हैं मां के रज से भीगा कपड़ा प्रसाद में किस्मत वालों को नसीब होता है.

  1. मूरत की नहीं, योनि की पूजा होती है

अकसर लड़कियों और महिलाओं को समाज के दायरे और मर्यादा में रहने की सीख दी जाती है. इतना ही नहीं, कहीं-कहीं तो लड़कियों को खुल कर बोलने की आज़ादी, तो दूर उन्हें अपने मन से कपड़े पहनने की भी इजाज़त नहीं होती, पर वहीं नीलांचल पर्वत के बीचों-बीच बसा मां कमाख्या का ये मंदिर समाज द्वारा बनाई हुई इन धारणाओं को भी ग़लत साबित करता है और यही बात इस मंदिर की ख़ासियत है.

दरअसल, दुनियाभर में चर्चित इस मंदिर में देवी की कोई मूर्ति नहीं है. यहां पर देवी के योनि भाग की ही पूजा की जाती है. मंदिर के अंदर एक कुंड सा बना हुआ है, जो हमेशा फूलों से ढका रहता है. इस जगह के पास में ही एक मंदिर है, जहां पर देवी की मूर्ति स्थापित है. इस जगह को महापीठ माना जाता है.

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